अगस्त के अंत तक शुरू हो सकती है सेवा, विद्यार्थियों और कर्मचारियों को मिलेगा पर्यावरण-अनुकूल आवागमन का नया विकल्प
शांति दूत न्यूज़.(उ.प्र.) वाराणसी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) ने स्वच्छ, आधुनिक और सतत परिवहन व्यवस्था को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए वाराणसी स्मार्ट सिटी के साथ साझेदारी की है। इस समझौते के तहत विश्वविद्यालय परिसर में ऐप-आधारित सार्वजनिक साइकिल एवं ई-बाइक शेयरिंग नेटवर्क स्थापित किया जाएगा। प्रस्तावित सेवा के अगस्त माह के अंत तक शुरू होने की संभावना है। नई व्यवस्था के तहत छात्र, शिक्षक, कर्मचारी एवं आगंतुक मोबाइल एप्लिकेशन के माध्यम से जीपीएस-सक्षम साइकिलों और उच्च क्षमता वाली ई-बाइक का उपयोग कर सकेंगे। एप के जरिए उपयोगकर्ता भुगतान कर आसानी से इन वाहनों को किराये पर लेकर परिसर में आवागमन कर सकेंगे। यह सुविधा न केवल विश्वविद्यालय के भीतर परिवहन को आसान बनाएगी, बल्कि शहर के व्यापक परिवहन नेटवर्क से भी जोड़ने में सहायक होगी। परियोजना के प्रथम चरण में बीएचयू परिसर के प्रमुख और अधिक आवागमन वाले स्थानों पर विशेष डॉकिंग स्टेशन स्थापित किए जाएंगे। यहां पारंपरिक पैडल साइकिलों के साथ-साथ ई-बाइक भी उपलब्ध रहेंगी। सभी वाहनों में लाइव जीपीएस ट्रैकिंग सिस्टम लगाया जाएगा, जिसे वाराणसी स्मार्ट सिटी के इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर से जोड़ा जाएगा, ताकि सुरक्षा और संचालन की निगरानी प्रभावी ढंग से की जा सके। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने इस पहल को बीएचयू की सतत विकास और सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति प्रतिबद्धता का महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने कहा कि यह साझेदारी न केवल परिसर में आवागमन को अधिक सुविधाजनक बनाएगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और स्वस्थ जीवनशैली को भी प्रोत्साहित करेगी। उन्होंने कहा कि बीएचयू केवल शैक्षणिक उत्कृष्टता तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक विकास और सामुदायिक कल्याण के लिए भी निरंतर प्रयासरत है। वाराणसी स्मार्ट सिटी के साथ यह संयुक्त पहल इसी सोच का विस्तार है।गौरतलब है कि हाल ही में बीएचयू और वाराणसी नगर निगम के बीच शहरी जीवन को बेहतर बनाने तथा विश्वविद्यालय समुदाय और शहरवासियों के हित में विभिन्न विकासात्मक परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए व्यापक सहमति बनी है। ई-बाइक और साइकिल शेयरिंग नेटवर्क उसी दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।विशेषज्ञों का मानना है कि इस पहल से परिसर में मोटर वाहनों पर निर्भरता कम होगी, प्रदूषण में कमी आएगी और विद्यार्थियों सहित विश्वविद्यालय समुदाय के बीच हरित एवं स्वस्थ परिवहन संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा।