शांति दूत न्यूज़. (उ.प्र.)वाराणसी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के वैज्ञानिकों ने चिकित्सा एवं आनुवंशिकी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए जन्मजात दंत-अभाव (जन्म से दांतों का न निकलना) से जुड़े एक नए जीन की पहचान की है। अत्याधुनिक मल्टी-ओमिक्स तकनीक पर आधारित यह शोध न केवल इस दुर्लभ दंत विकार के आनुवंशिक कारणों को समझने में मील का पत्थर साबित होगा, बल्कि कई अन्य गंभीर बीमारियों से इसके संभावित संबंधों का भी खुलासा करता है। यह शोध अंतर्राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका ‘जीन’ (Gene) के जून-2026 अंक में प्रकाशित हुआ है। यह शोध बीएचयू के विज्ञान संस्थान स्थित सेंटर फॉर जेनेटिक डिसऑर्डर्स में डॉ. प्रशांत रंजन ने अपने पीएचडी शोध के दौरान प्रोफेसर परिमल दास के निर्देशन में पूरा किया। वर्तमान में डॉ. प्रशांत रंजन अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली में प्रोजेक्ट रिसर्च साइंटिस्ट-2 के पद पर कार्यरत हैं।शोधकर्ताओं ने होल एक्सोम सीक्वेंसिंग, ट्रांसक्रिप्टोमिक्स, प्रोटीन संरचना विश्लेषण तथा बायोइन्फॉर्मेटिक्स जैसी अत्याधुनिक तकनीकों का उपयोग करते हुए जन्मजात दंत-अभाव के आनुवंशिक एवं आणविक आधार का विस्तृत अध्ययन किया। इस दौरान कई नए और पहले से ज्ञात आनुवंशिक परिवर्तनों की पहचान की गई। इस शोध की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि OR4F21 नामक जीन को पहली बार जन्मजात दंत-अभाव से संभावित रूप से जोड़ना है। इसके साथ ही EDA, WNT10A, PAX9 और TSPEAR जैसे प्रमुख दंत-विकास जीनों में भी रोग से जुड़े महत्वपूर्ण आनुवंशिक परिवर्तनों का विश्लेषण किया गया, जिससे इस बीमारी के विकास की प्रक्रिया को और स्पष्ट रूप से समझने में सफलता मिली। शोध का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी सामने आया कि जन्मजात दंत-अभाव केवल दांतों तक सीमित समस्या नहीं है, बल्कि इसका संबंध शरीर की अन्य कई गंभीर बीमारियों से भी हो सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज भविष्य में रोगों की प्रारंभिक पहचान, जोखिम मूल्यांकन और सटीक उपचार पद्धति विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। प्रोफेसर परिमल दास ने बताया कि यह अध्ययन मानव दंत-विकास के जटिल आणविक तंत्र को समझने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इससे भविष्य में जन्मजात दंत विकारों के बेहतर निदान, समय रहते पहचान और लक्षित उपचार विकसित करने का मार्ग प्रशस्त होगा। इस शोध में इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (आईएमएस), बीएचयू के डॉ. नेहा वर्मा, डॉ. राजेश बंसल और डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव ने रोगियों की पहचान, नैदानिक मूल्यांकन और जीन-फेनोटाइप संबंध स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वहीं डॉ. चंद्रा देवी और शोधार्थी रिमझिम कुमारी ने प्रयोगात्मक कार्य, डेटा विश्लेषण तथा मल्टी-ओमिक्स अध्ययन में उल्लेखनीय योगदान दिया।वैज्ञानिकों का मानना है कि यह उपलब्धि न केवल जन्मजात दंत-अभाव की वैज्ञानिक समझ को नया आयाम देगी, बल्कि यह भी सिद्ध करती है कि भारतीय वैज्ञानिक जटिल आनुवंशिक रोगों पर विश्वस्तरीय शोध कर वैश्विक चिकित्सा विज्ञान में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। बीएचयू की यह उपलब्धि भारतीय वैज्ञानिक अनुसंधान की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा का भी प्रमाण है।