
FOLLOW US:
सूत्रों के अनुसार, इस व्हाट्सऐप ग्रुप के माध्यम से विभागीय निर्देश और कार्य संबंधी आदेश जारी किए जाते हैं। आरोप है कि मृत्युंजय दुबे नामक व्यक्ति, जो कथित रूप से विभाग के अधिकृत सदस्य नहीं हैं, समूह में सक्रिय भूमिका निभाते हुए दिशा-निर्देश देते हैं। वहीं प्रशांत नामक एक मेडिकल ऑफिसर पर भी बिना किसी लिखित आदेश के कार्य करने तथा ऑपरेशन थिएटर तक पहुंच बनाने के आरोप लगाए जा रहे हैं।
मामले को लेकर सबसे गंभीर सवाल ऑपरेशन थिएटर के रिकॉर्ड को लेकर उठ रहे हैं। चर्चा है कि संबंधित मेडिकल ऑफिसर का नाम ओटी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं किया जाता। यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह न केवल चिकित्सा प्रोटोकॉल बल्कि संस्थागत पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े करता है। मृत्युंजय दुबे का नाम इससे पहले भी विवादों में आ चुका है। उन पर पूर्व में डॉ. सौरभ सिंह के नाम पर धन लेने के आरोप लग चुके हैं। हालांकि इन आरोपों की अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और न ही किसी जांच का सार्वजनिक निष्कर्ष सामने आया है। विभाग के भीतर यह चर्चा भी तेज है कि पूरा तंत्र डॉ. सौरभ सिंह से जुड़े कार्यों के इर्द-गिर्द संचालित हो रहा है तथा जूनियर डॉक्टरों को इसी अनौपचारिक माध्यम से दिशा-निर्देश दिए जा रहे हैं। इसके अलावा ट्रॉमा सेंटर प्रभारी के लंबे कार्यकाल को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। जहां देश के प्रधानमंत्री का कार्यकाल पांच वर्ष का निर्धारित होता है, वहीं ट्रॉमा सेंटर प्रभारी का कार्यकाल पांच वर्षों से अधिक समय तक जारी रहने को लेकर प्रशासनिक स्पष्टता की मांग की जा रही है। स्थानीय स्तर पर कुछ लोगों ने इस पूरे प्रकरण को “मालवीय जी की बगिया में मरीजों के साथ धोखा” जैसे शब्दों में व्यक्त किया है। इससे संस्थान की साख, प्रशासनिक व्यवस्था और मरीजों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। हालांकि इन सभी आरोपों पर अभी तक विश्वविद्यालय प्रशासन या संबंधित अधिकारियों की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि बीएचयू प्रशासन इस संवेदनशील मामले में क्या रुख अपनाता है और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।WhatsApp us