“गुरुदक्षिणा से गुरुविस्मरण तक”: बीएचयू में शोधपत्र विवाद ने गुरु-शिष्य परंपरा पर खड़े किए गंभीर सवाल

SHARE:

शांति दूत न्यूज़.(उ.प्र.) वाराणसी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बी एच यू) एक बार फिर शैक्षणिक विवादों के केंद्र में है। इस बार मामला केवल एक शोधपत्र का नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था की उस गुरु-शिष्य परंपरा का है, जिसकी मिसाल सदियों से दी जाती रही है। आरोप है कि हड्डी रोग विभाग के आधा दर्जन सीनियर रेज़िडेंट्स ने अपने वरिष्ठ गुरु एवं मार्गदर्शक का नाम शामिल किए बिना शोधपत्र प्रकाशित करा दिया। इस घटनाक्रम ने विश्वविद्यालय परिसर में तीखी प्रतिक्रिया पैदा कर दी है। भारतीय संस्कृति में गुरु को ईश्वर से भी ऊंचा स्थान दिया गया है। प्राचीन समय में शिष्य शिक्षा पूर्ण होने के बाद गुरु दक्षिणा देने को स्वयं उत्सुक रहते थे। वे इसे केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन का ऋण मानते थे। लेकिन आधुनिक प्रतिस्पर्धा और व्यक्तिगत उपलब्धियों की दौड़ में अब हालात इतने बदलते दिखाई दे रहे हैं कि कुछ शिष्य अपने गुरु के योगदान को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करना भी जरूरी नहीं समझ रहे। बीएचयू का यह विवाद उसी बदलती मानसिकता का प्रतीक माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार संबंधित शोध कार्य विभाग के एक वरिष्ठ प्राध्यापक के मार्गदर्शन में तैयार हुआ था। आरोप है कि शोधपत्र प्रकाशित करते समय उनके नाम को जानबूझकर शामिल नहीं किया गया। इसे अकादमिक नैतिकता, शोध मर्यादा और बौद्धिक ईमानदारी के खिलाफ गंभीर कदम माना जा रहा है। विश्वविद्यालय के शिक्षकों और शोधार्थियों के बीच इस मुद्दे को लेकर चर्चा तेज हो गई है। इस बारे में पूछे जाने पर चिकित्सा विज्ञान संस्थान के निदेशक डा० एस एन शंखवार ने कहा कि मामले की जानकारी मिली है, तथा डॉ मनोज पाण्डेय को इसकी जांच के लिए अधिकृत किया गया है। वहीं‌ मामले में सीनियर रेज़िडेंट डॉ. रविकांत मौर्य का नाम प्रमुखता से सामने आ रहा है। बताया जा रहा है कि वे पूर्व में भी निजी प्रैक्टिस से जुड़े विवादों में चर्चा में रह चुके हैं। हालांकि इस पूरे मामले पर संबंधित पक्षों की आधिकारिक प्रतिक्रिया अभी सामने नहीं आई है। शिक्षाविदों का मानना है कि शोध केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं होता, बल्कि वह सामूहिक बौद्धिक श्रम और मार्गदर्शन का परिणाम होता है। ऐसे में यदि किसी गुरु या गाइड के योगदान की अनदेखी की जाती है, तो यह केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं बल्कि पूरी शैक्षणिक व्यवस्था की गरिमा को प्रभावित करता है।बीएचयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में सामने आए इस विवाद ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में गुरु-शिष्य संबंध केवल औपचारिकता बनकर रह गया है। अब विश्वविद्यालय प्रशासन की जांच और संभावित कार्रवाई पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं।

Ashutosh Tiwari
Author: Ashutosh Tiwari

Leave a Comment

सबसे ज्यादा पड़ गई