चंदौली सदर कोतवाली में बैठे चिकित्सक तथा उनके समर्थक
शांति दूत न्यूज़.उत्तर प्रदेश, चंदौली। जिला मुख्यालय पर स्थित एक निजी चिकित्सालय के. जी. नंदा में बुधवार की देर शाम महिला आयोग की सदस्य सुनिता श्रीवास्तव का अचानक पहुँचना अब सिर्फ एक विवाद नहीं, बल्कि प्रक्रिया, अधिकार और मंशा पर सीधा सवाल बन गया है। बताते चलें कि बुधवार की देर शाम को उक्त चिकित्सालय में महिला आयोग की सदस्य के पहुंचने के बाद वहां चिकित्सालय के प्रबंधक से कुछ ऐसी बातचीत हुई कि वहां भर्ती तथा उपचार के लिए आई सैकड़ों महिलाएं चिकित्सक के साथ सदर कोतवाली पहुंच गई वहीं चिकित्सक अपनी वेबसी को दर्शाते हुए रोते रहे उनके साथ पहुंचे लोगों ने महिला आयोग की सदस्य के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की मांग करने लगे।
मामला देर रात तक चलता रहा पुलिस ने किसी तरह समझा कर शांत कराया। वहीं आयोग की सदस्य जहां यह कहकर अपने दौरे को सामान्य बताने की कोशिश कर रही हैं कि वह “महिलाओं की भीड़ देखकर” वहां चली गईं, वहीं ज़मीनी तथ्य इस दावे से पूरी तरह टकराते नजर आ रहे हैं।
(महिला आयोग की सदस्य सुनीता श्रीवास्तव का बयान)
पहला सवाल: अगर यह आकस्मिक था, तो पुलिस ने चिकित्सालय के प्रबंधक को पहले सूचना क्यों दी?
डाक्टर आनंद प्रकाश तिवारी का दावा है कि महिला आयोग की सदस्य के आने से पहले उन्हें पुलिस द्वारा फोन कर सूचित किया गया, बल्कि एक सिपाही को अस्पताल भेजकर यहां तक कहा गया कि डॉक्टर बाहर आकर आयोग की सदस्य को बाहर जाकर रीसीव करें। यदि आयोग की सदस्य सचमुच “संयोगवश” वहां पहुँची थीं, तो पुलिस की यह सक्रियता किस आदेश पर थी?
दूसरा सवाल: चार महिलाएं साथ क्यों थीं और उनकी भूमिका क्या थी?
(के जी नंदा के डायरेक्टर डॉ आनंद तिवारी का बयान)
डॉ. तिवारी के अनुसार, महिला आयोग की सदस्य चार अन्य महिलाओं के साथ अस्पताल पहुँचीं। इन महिलाओं ने अस्पताल की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए दुर्व्यवस्था, लापरवाही और अव्यवस्थित इलाज जैसे गंभीर आरोप लगाए। सवाल उठता है कि
👉 ये महिलाएं कौन थीं?
👉 क्या वे शिकायतकर्ता थीं?
👉 या फिर बिना किसी शिकायत के “गवाह” तैयार किए गए?
तीसरा सवाल: अधिकार से आगे जाकर धमकी क्यों?
डॉक्टर का आरोप है कि महिला आयोग की सदस्य ने बातचीत के दौरान मुकदमा दर्ज कर जेल भेजने की धमकी दी और बिना किसी लिखित नोटिस, जांच या रिपोर्ट के वहां से चली गईं। कानून के जानकारों के मुताबिक, महिला आयोग न तो एफआईआर दर्ज करा सकता है, न ही जेल भेजने का आदेश दे सकता है—उसका अधिकार केवल सिफारिश तक सीमित है। चौथा सवाल: जब सब रिकॉर्ड है, तो जांच से परहेज़ क्यों? डॉ. तिवारी का दावा है कि पूरा घटनाक्रम वॉयस रिकॉर्डिंग और सीसीटीवी कैमरों में कैद है।