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गीता जयंती एवं मोक्षदा एकादशी के पावन अवसर पर तीर्थराज काशी की पवित्र गलियों में बुधवार को दिव्य आध्यात्मिक माहौल देखने को मिला।
संत आशाराम बापू के शिष्यों ने काशी विश्वनाथ कॉरिडोर क्षेत्र में भव्य हरिनाम संकीर्तन यात्रा निकालकर संपूर्ण शहर को भक्तिमय बना दिया।वाराणसी आश्रम के मुख्य सेवादार विश्वनाथ भाई अपने सिर पर श्रीमद्भागवत गीता को धारण किए संकीर्तन यात्रा का नेतृत्व कर रहे थे। वहीं कार्यक्रम के संयोजक व ऋषिप्रसाद पत्रिका के सेवाकार्य में सक्रिय बाबूलाल भाई सैकड़ों साधकों के साथ गगनभेदी कीर्तन करते आगे बढ़ते रहे। यात्रा मैदागिन चौराहे से प्रारंभ होकर दशाश्वमेध घाट तक पहुँची। सड़कें “हरिनाम” के मधुर स्वरों से गुंजायमान थीं।
आगे कीर्तन मंडली और पीछे साधकों का भावपूर्ण नृत्य—पूरा वातावरण अध्यात्म, भक्ति और आनंद से ओतप्रोत हो उठा। राहगीर भी ताली बजाकर इस दिव्य अनुष्ठान में सहभागी होते दिखे। विश्वनाथ भाई ने बताया कि—“गीता जयंती और मोक्षदा एकादशी के उपलक्ष्य में यह यात्रा निकाली गई है। इससे पूर्व भी आशाराम बापू के निर्देशानुसार अनेक बार विशाल संकीर्तन यात्राएँ निकालकर सनातन संस्कृति के प्रचार-प्रसार का कार्य किया गया है।
”साधकों ने बताया कि आशाराम बापू निरंतर गीता पाठ के लिए प्रेरित करते रहे हैं। उनके देश-विदेश स्थित आश्रमों में अल्प मूल्य में उपलब्ध आध्यात्मिक पुस्तकों में श्रीमद्भागवत गीता विशेष रूप से उपलब्ध रहती है। उनका संदेश है कि—“जो गीता को ठीक से समझ लेता है, वह भगवत तत्व को जान संसार सागर से पार हो जाता है।”दशाश्वमेध घाट पर संकीर्तन यात्रा के समापन पर सामूहिक गीता पाठ, गंगा आरती और कीर्तन का भव्य आयोजन हुआ।
इस अवसर पर 150 श्रीमद्भागवत गीता एवं 2000 भारतीय संस्कृति विशेषांक ऋषि प्रसाद पुस्तक का वितरण भी किया गया।
कार्यक्रम के संयोजक बाबूलाल भाई ने बताया कि—“आगामी 26 जनवरी को नौका-विहार भजन का भव्य आयोजन किया जाएगा।”
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