बीएचयू के शोध में आयुर्वेदिक औषधि ‘ओएक्योर’ से जोड़ों की सूजन और क्षरण में मिले सुधार के संकेत

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शांति दूत न्यूज़.वाराणसी, ऑस्टियोआर्थराइटिस यानी जोड़ों के क्षरण से जुड़ी बीमारी के उपचार की संभावनाओं को लेकर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के शोधकर्ताओं ने एक महत्वपूर्ण अध्ययन किया है। पांच औषधीय पौधों से तैयार आयुर्वेदिक फॉर्मूलेशन ‘ओएक्योर’ (OAcure) का प्रयोगात्मक अध्ययन चूहों पर किया गया। इसमें जोड़ों की सूजन कम होने, उपास्थि (कार्टिलेज) को क्षति से बचाने और उसके नीचे स्थित हड्डी की संरचना में सुधार के संकेत मिले हैं। हालांकि, ये परिणाम अभी पशु-अध्ययन तक सीमित हैं और मनुष्यों में इसकी प्रभावशीलता तथा सुरक्षा प्रमाणित होना बाकी है। शोधपत्र “Chondroprotective and Anti-inflammatory Effects of an Ayurvedic Nutraceutical (OAcure) in Experimental Osteoarthritis” वैज्ञानिक पत्रिका Proceedings of the Indian National Science Academy में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन का उद्देश्य यह समझना था कि ओएक्योर का जोड़ों की सूजन, उपास्थि के क्षरण और हड्डियों की संरचना में होने वाले बदलावों पर क्या प्रभाव पड़ता है।ऑस्टियोआर्थराइटिस में उपास्थि धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होती है। इसके साथ जोड़ की भीतरी झिल्ली में सूजन और हड्डी की संरचना में बदलाव भी हो सकते हैं। इससे दर्द, अकड़न और चलने-फिरने में परेशानी होती है। हालांकि इन औषधियों की गुणवत्ता तथा होने वाले लाभों के बारे में आयुर्वेदिक ग्रंथों में पहले से ही वर्णित है। नये अध्ययन में ओएक्योर प्राप्त करने वाले चूहों में जोड़ की भीतरी झिल्ली की सूजन यानी सिनोवाइटिस में कमी दर्ज की गई। शोधकर्ताओं ने सूजन से जुड़ी कोशिकाओं के स्वरूप में बदलाव के संकेत भी पाए। इसके अलावा NF-κB और IL-1β जैसे सूजन से संबंधित जैविक कारकों की अभिव्यक्ति में कमी देखी गई। शोध के दौरान उपास्थि की संरचना से जुड़े टाइप-II कोलेजन की अभिव्यक्ति में वृद्धि के संकेत मिले। वहीं, उपास्थि के क्षरण से संबंधित MMP-13 और ADAMTS-5 जैसे संकेतकों तथा टाइप-X कोलेजन की अभिव्यक्ति में कमी दर्ज की गई। शोधकर्ताओं ने माइक्रो-सीटी तकनीक के माध्यम से उपास्थि के नीचे स्थित हड्डी की संरचना का भी विश्लेषण किया, जिसमें अस्थि खनिज घनत्व और हड्डी की आंतरिक संरचना से जुड़े कुछ मापदंडों में सुधार के संकेत मिले।

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ओएक्योर में पांच औषधीय पौधों का इस्तेमाल किया गया है। इनमें अश्वगंधा, शतावरी, विदारीकंद, गिलोय और Curculigo orchioides शामिल हैं। अध्ययन में प्रयुक्त वनस्पतियों की पहचान और प्रमाणीकरण बीएचयू के आयुर्वेद संकाय के द्रव्यगुण विभाग द्वारा किया गया। शोध में पारंपरिक औषधीय वनस्पतियों पर आधारित इस बहु-घटक फॉर्मूलेशन का मूल्यांकन आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों से किया गया। इसके लिए ऊतकों की जांच, इम्यूनोहिस्टोकेमिस्ट्री, इम्यूनोफ्लोरेसेंस, जीन-अभिव्यक्ति विश्लेषण और त्रि-आयामी माइक्रो-सीटी इमेजिंग जैसी पद्धतियों का सहारा लिया गया।यह अध्ययन बीएचयू के इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के जूलॉजी विभाग और आयुर्वेद संकाय के द्रव्यगुण विभाग सहित संबंधित शोध समूहों के सहयोग से किया गया। शोध दल में अनिरबान रॉय, रत्ना सहानी, निकिता सिंह, डॉ. संजीव कुमार, डॉ. संजय यादव और समीर गुप्ता शामिल रहे। शोध का नेतृत्व जूलॉजी विभाग के डॉ. अमरेश कुमार सिंह ने किया। शोध के निष्कर्षों से प्रयोगात्मक मॉडल में जोड़ों की सूजन, उपास्थि के क्षरण और हड्डी की संरचना से जुड़े कई जैविक संकेतकों में सकारात्मक बदलाव के संकेत मिलते हैं। फिर भी, केवल चूहों पर किए गए अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि ओएक्योर मनुष्यों में ऑस्टियोआर्थराइटिस का प्रभावी उपचार है। इसके चिकित्सकीय लाभ, सुरक्षा और उपयुक्त मात्रा की पुष्टि के लिए आगे नियंत्रित वैज्ञानिक परीक्षण आवश्यक होंगे।

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