गीता के ज्ञान से विद्यार्थियों में नैतिक एवं आध्यात्मिक चेतना का विकास जरूरी

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शांति दूत न्यूज़.उ.प्र. वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के मालवीय भवन में रविवार को गीता समिति द्वारा आयोजित ‘रविवासरीय गीता प्रवचन’ के नए सत्र का शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ वेद विभाग के विद्यार्थियों द्वारा वैदिक मंगलाचरण तथा संगीत एवं मंच कला संकाय के विद्यार्थियों द्वारा कुलगीत एवं भजन गायन से हुआ इस अवसर पर प्रो. हृदयरंजन शर्मा ने कहा कि महामना मदन मोहन मालवीय का दृढ़ विश्वास था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल बौद्धिक विकास तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि विद्यार्थियों में नैतिक एवं आध्यात्मिक चेतना का विकास भी आवश्यक है। इसी विचार को ध्यान में रखते हुए महामना ने विश्वविद्यालय में ‘रविवासरीय  गीता प्रवचन’ की परंपरा प्रारंभ की थी। विद्यार्थियों के सर्वांगीण व्यक्तित्व विकास के लिए श्रीमद्भगवद्गीता के सार्वभौमिक जीवन-मूल्यों एवं सिद्धांतों से उनका परिचय आवश्यक हकार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलसचिव राजन श्रीवास्तव ने कहा कि वर्तमान समय में भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिकता और श्रीमद्भगवद्गीता के प्रति विद्यार्थियों में रुचि बढ़ाने की आवश्यकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि नवप्रवेशी विद्यार्थियों के इंडक्शन कार्यक्रम में गीता से संबंधित आयोजन को भी शामिल किया जाए, ताकि उनमें प्रारंभ से ही भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति जुड़ाव विकसित हो सके। उन्होंने कहा कि गीता के माध्यम से मन को संस्कारित करने और जीवन-मूल्यों को सुदृढ़ करने का प्रयास आवश्यक है। मालवीय भवन के मानित निदेशक प्रो. पतंजलि मिश्रा ने कहा कि वर्तमान समय में बढ़ती भौतिक प्रतिस्पर्धा और तनाव के कारण व्यक्ति अनेक प्रकार के मानसिक एवं शारीरिक कष्टों से जूझ रहा है। ऐसे समय में गीता के जीवन-दर्शन की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है।गीता समिति के सचिव प्रो. उपेंद्र कुमार त्रिपाठी ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय ज्ञान परंपरा का अमूल्य ग्रंथ है, जो मनुष्य को कर्तव्य, आत्मसंयम एवं सदाचार का मार्ग दिखाता है। उन्होंने बताया कि महामना ने विश्वविद्यालय परिवार से प्रत्येक रविवार डेढ़  घंटे गीता प्रवचन में शामिल होने के लिए समय-दान को गुरु दक्षिणा के रूप में देने की अपील की मुख्य अतिथि स्वामीनारायण गुरुकुल, अहमदाबाद (गुजरात) के अध्यक्ष सद्गुरु माधव प्रियदास जी ने गीता के अध्ययन, मनन और उसके अनुरूप जीवन जीने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने अहं की भावना का त्याग कर विनम्रता एवं आत्मसंयम के साथ जीवन जीने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल बाहरी ज्ञान से परिचित कराना नहीं, बल्कि व्यक्ति को उस ज्ञान को ग्रहण करने योग्य बनाना भी है।उन्होंने भगवान विष्णु के त्रिविक्रम स्वरूप का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार त्रिविक्रम ने तीन पगों में समस्त ब्रह्मांड को नाप लिया, उसी प्रकार गीता जैसे विराट विषय को सीमित शब्दों में समेटना कठिन है। उन्होंने कहा कि किसी विषय को समझे बिना उसका विवेचन संभव नहीं है, इसलिए गीता के संदेश को समझकर उसके मर्म पर विचार करना आवश्यक है। बता दें कि ‘रविवासरीय गीता प्रवचन’ प्रत्येक रविवार प्रातः 10 से 11:30 बजे तक आयोजित किया जाता है और पूरे शैक्षणिक सत्र में इसकी निरंतरता बनी रहती है।कार्यक्रम का संचालन भारत अध्ययन केंद्र के समन्वयक प्रो. शारदिंदु कुमार त्रिपाठी ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन गीता समिति की संयुक्त सचिव प्रो. सुमन जैन ने किया। कार्यक्रम में प्रो. राजाराम शुक्ल, प्रो. उदय प्रताप शाही, डॉ. अर्चना शाही, प्रो. सुनील कात्यायन, प्रो. वी.के. मिश्रा, प्रो. मृत्युंजय देव, प्रो. लल्लन मिश्र, प्रो. सदाशिव द्विवेदी, प्रो. प्रद्युम्न शाह सिंह, प्रो. विजय शंकर शुक्ल, डॉ. उषा शुक्ल, डॉ. प्रभात सिंह, प्रो. मुकुट मणि त्रिपाठी, प्रो. राजकुमार मिश्र, डॉ. शन्ना लाल मौर्या, डॉ. मारकण्डेय राम पाठक, प्रो. डी.के. मिश्र, प्रो. कमलेश झा, प्रो. लता शर्मा, प्रो. रुद्र प्रकाश मलिक, डॉ. कृष्णानन्द सिंह, डॉ. सिद्धि दात्री भारद्वाज, डॉ. आशा शर्मा सहित विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायों के शिक्षक, कर्मचारी, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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