शांति दूत न्यूज़. देश के प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों में शामिल और पूर्वांचल का एम्स माने जाने वाला काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) इन दिनों अपनी स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सवालों के घेरे में है। विंटर वेकेशन के दौरान जारी किए गए रोस्टर के अनुसार अब संस्थान में सप्ताह में केवल तीन दिन ही मेजर ऑपरेशन किए जाएंगे, जबकि शेष दिनों में ऑपरेशन थिएटर सीमित रहेंगे।
यह स्थिति ऐसे समय सामने आई है, जब हाल ही में यह दावा किया गया था कि ट्रॉमा सेंटर में रात 10 बजे तक सर्जरी की सुविधा दी जाएगी। हालांकि, जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग नजर आ रही है। ऑपरेशन थिएटर के दिनों में कटौती ने न सिर्फ मरीजों की परेशानी बढ़ाई है, बल्कि संस्थान की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। कुछ लोग लगातार विशेष पदों पर बने हुए हैं।
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, AIIMS दिल्ली, PGI चंडीगढ़ जैसे केंद्रीय संस्थानों में व्यवस्था है कि शीतकालीन या ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान भी कम से कम 50 प्रतिशत फैकल्टी और स्टाफ प्रतिदिन मेजर सर्जरी सेवाएं सुनिश्चित करता है, ताकि मरीजों के उपचार में कोई बाधा न आए। AIIMS और PGI जैसे संस्थानों में अवकाश के समय भी ऑपरेशन थिएटर की निरंतरता बनाए रखना अनिवार्य प्रशासनिक दायित्व माना जाता है। इसके विपरीत BHU में ऑपरेशन के दिनों को आधा कर देना ग़भीर प्रश्न उत्पन्न करता है।
BHU ट्रॉमा सेंटर न केवल वाराणसी, बल्कि पूर्वांचल, बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों के गंभीर मरीजों के लिए जीवनरेखा है। ऐसे में सर्जरी की उपलब्धता सीमित होने से— ऑपरेशन की तारीखें आगे बढ़ेंगी मरीजों को निजी अस्पतालों की ओर मजबूर होना पड़ेगा तथा आर्थिक और मानसिक बोझ बढ़ेगा। अवकाश घोषित करते समय यह कहा गया था कि 50 प्रतिशत फैकल्टी ड्यूटी पर रहेगी, जिससे स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित नहीं होंगी। लेकिन ड्यूटी रोस्टर सामने आने के बाद यह दावा कमजोर पड़ता दिख रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि फैकल्टी उपलब्ध है, तो ऑपरेशन थिएटर की संख्या घटाना नीतिगत चूक मानी जानी चाहिए। BHU प्रशासन AIIMS–PGI मॉडल के अनुरूप व्यवस्था लागू करे तथा ऑपरेशन थिएटर को सप्ताह के सभी कार्य दिवसों में संचालित किया जाए तथा मरीजों के हित को प्राथमिकता दी जाए।
जहां एक ओर देश के केंद्रीय चिकित्सा संस्थान अवकाश के दौरान भी निर्बाध सेवाएं देने का उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं, वहीं BHU जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में सप्ताह में केवल तीन दिन मेजर ऑपरेशन की व्यवस्था गंभीर चिंता का विषय बन गई है। यह मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य से जुड़ा राष्ट्रीय प्रश्न बनता जा रहा है।