शांति दूत न्यूज़ (उ.प्र.)वाराणसी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह की जन्मशती पर आयोजित तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन प्रेमचंद सभागार में गरिमामय वातावरण में हुआ। समापन सत्र में प्रसिद्ध आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि “नामवर जी की आलोचना में सभ्यताओं का संवाद दिखता है।” उन्होंने बताया कि नामवर जी जब आलोचना के स्वभाव पर बल देते हैं तो वह साहित्यिक और सांस्कृतिक दायित्व का निर्वहन होता है।
उनकी कृति ‘कविता के नए प्रतिमान’ में आलोचना अपने पूर्ण वैभव में दिखाई देती है और वे आनंदवर्धन से लेकर टी.एस. इलियट तक समान सहजता से संवाद करते हैं। विशिष्ट अतिथि नव नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति सिद्धार्थ सिंह ने कहा कि नामवर जी की जिज्ञासा असीम थी। वे बौद्ध साहित्य, इतिहास और दर्शन का गहन अध्ययन करते थे तथा ज्ञान के प्रति गहरी आस्था रखते थे। मंच पर वे निर्भीक और असहमतियों को स्वीकार करने वाले विद्वान थे। सत्र की अध्यक्षता हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. वशिष्ठ द्विवेदी ‘अनूप’ ने की।
उन्होंने कहा कि संगोष्ठी में श्रद्धा तो थी, पर अंधभक्ति नहीं,यह नामवर जी की बौद्धिक परंपरा के अनुरूप है। स्वागत वक्तव्य डॉ. रवि शंकर सोनकर ने दिया, जबकि मुख्य अतिथि कला संकाय प्रमुख प्रो. सुषमा घिल्डियाल ने संगोष्ठी की व्यापकता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इसमें देश-विदेश के 52 विशेषज्ञों और लगभग 400 प्रतिभागियों ने भाग लिया। ‘समकालीन विश्व और भारतीय समाज’ विषयक सत्र में प्रो. बिंदा परांजपे ने नामवर जी की इतिहास-दृष्टि को समकालीन संदर्भों में महत्वपूर्ण बताया। डॉ. अनुज लुगुन ने उनके चिंतन को अंतर-अनुशासनिक और लोकोन्मुखी बताया। ‘विश्व साहित्य और नामवर सिंह’ सत्र में उज्ज्वल भट्टाचार्य, श्रीलंका की डॉ. रसांगी नायक्कर तथा चीन से आए विद्वानों डॉ. राजीव रंजन और डॉ. विवेक मणि त्रिपाठी ने नामवर जी की वैश्विक दृष्टि और प्रगतिशील आलोचना पर विचार रखे। समापन सत्र का संचालन डॉ. प्रीति त्रिपाठी ने किया और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. आशीष त्रिपाठी ने दिया।




