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श्रद्धालुओं ने तुलसी को भारतीय जीवन की आधारशिला बताते हुए उन्हें स्वास्थ्य, सदाचार और पर्यावरण संतुलन का प्रतीक माना। संत आशाराम बापू के शिष्यों ने बताया कि बापू यह अभियान चलाते हुए तथा तुलसी की महिमा को बताते हुए अपने सभी शिष्यों को निर्देशित किये थे कि सभी लोग हर वर्ष 25 दिसंबर को तुलसी का पूजन करें तथा औरों को भी इसके लिए प्रेरित करें। उनके विचारों से प्रेरित होकर आयोजकों ने बताया कि तुलसी केवल धार्मिक महत्व की वनस्पति नहीं, बल्कि मानव स्वास्थ्य, वायु शुद्धि और मानसिक शांति का अनुपम स्रोत है।
कार्यक्रम के दौरान उपस्थित जनसमूह को तुलसी के औषधीय गुणों, उसके वैज्ञानिक महत्व और दैनिक जीवन में उपयोग के विषय में भी जागरूक किया गया।अहमदाबाद, हरिद्वार, दिल्ली, जोधपुर, छिंदवाड़ा,इंदौर, लखनऊ ,वाराणसी, चंदौली, भदोही सहित देश के विभिन्न आश्रमों के साथ-साथ विदेशों में स्थित आश्रमों में भी तुलसी पूजन कार्यक्रम समान भाव और संकल्प के साथ आयोजित किया गया।
यह दृश्य दर्शाता है कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा आज भी वैश्विक स्तर पर लोगों को जोड़ने की शक्ति रखती है। बता दें कि वाराणसी में इनके शिष्यों द्वारा गिरजाघर के सामने हजारों तुलसी के पौधे तथा ऋषि प्रसाद पत्रिका का वितरण किया गया।कार्यक्रम के अंत में शांति पाठ के साथ विश्व कल्याण, पर्यावरण संरक्षण और मानवता की मंगलकामना की गई।
भक्तों ने संकल्प लिया कि वे अपने घरों में तुलसी का संरक्षण करेंगे और भावी पीढ़ी को इसके महत्व से परिचित कराएंगे।WhatsApp us