(दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए कुलपति प्रो अजित कुमार चतुर्वेदी)
शांति दूत न्यूज़. उत्तर प्रदेश, वाराणसी- 17 दिसम्बर भारतीय पारंपरिक चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद को वैश्विक स्वास्थ्य समाधान के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के चिकित्सा विज्ञान संस्थान अंतर्गत आयुर्वेद संकाय द्वारा बुधवार को तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ किया गया।
“आयुर्वेद में अत्याधुनिक अनुसंधान: वैश्विक स्वास्थ्य का परिवर्तन” विषय पर आधारित इस सम्मेलन का उद्घाटन के. एन. उड्डुपा सभागार में हुआ।सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने आयुर्वेद संकाय के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार के वैश्विक विमर्श न केवल आयुर्वेद को वैज्ञानिक मान्यता दिलाने में सहायक हैं, बल्कि समग्र स्वदेशी चिकित्सा पद्धतियों को भारत और विश्व स्तर पर स्वीकार्यता दिलाने का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं।
उन्होंने रोगियों को समन्वित चिकित्सा पद्धतियों की सही जानकारी उपलब्ध कराने पर बल देते हुए भविष्य की एक ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था की परिकल्पना की, जहां आयुर्वेद, आधुनिक चिकित्सा, यूनानी एवं अन्य पद्धतियों के विशेषज्ञ मिलकर रोगी को उपचार के विकल्प उपलब्ध कराएं और निर्णय रोगी स्वयं ले।
दक्षिण कोरिया से पधारे विशिष्ट अतिथि श्री टैखोन ली, अध्यक्ष के.आई.एफ.आर.ए., ने भारत और कोरिया के प्राचीन सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक संबंधों को रेखांकित करते हुए कहा कि बौद्ध धर्म के रूप में भारत ने कोरिया को अमूल्य विरासत दी है।
उन्होंने
पारंपरिक एवं सामुदायिक मूल्यों के संरक्षण को आधुनिक समाज के लिए आवश्यक बताया। साथ ही घोषणा की कि आगामी वर्ष से आयुर्वेद संकाय, बीएचयू के एक प्रोफेसर एवं एक विद्यार्थी को कोरिया आमंत्रित कर भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सा का प्रशिक्षण दिया जाएगा, जिसमें कोरियाई सरकार सहयोग प्रदान करेगी।
श्रीलंका से आईं विशिष्ट अतिथि प्रो. स्वर्णा हपुआरच्ची, पूर्व निदेशक, इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिजिनस मेडिसिन, कोलंबो विश्वविद्यालय, ने आयुर्वेदिक औषधियों की गुणवत्ता, सुरक्षा और वैश्विक नियामक मानकों की आवश्यकता पर जोर दिया।

आयोजन में आयुर्वेद संकाय के अध्यक्ष प्रो. पी. के. गोस्वामी तथा आयोजन सचिव डॉ. ए. के. द्विवेदी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस अवसर पर अमेरिका में आयुर्वेद की स्थिति पर हिंदू यूनिवर्सिटी ऑफ अमेरिका की फैकल्टी सदस्य एवं बीएचयू की पूर्व छात्रा डॉ. वंदना बर्नवाल ने विशेष वक्तव्य दिया। कार्यक्रम के दौरान आयुर्वेद संकाय के शिक्षकों द्वारा लिखित तीन महत्वपूर्ण पुस्तकों का विमोचन भी किया गया, जो आयुर्वेद को वैश्विक विमर्श के केंद्र में स्थापित करने की दिशा में मील का पत्थर मानी जा रही हैं। तीन दिवसीय यह सम्मेलन पारंपरिक एवं समन्वित स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में एक सशक्त वैश्विक मंच के रूप में उभर रहा है।



