शांति दूतन्यूज़.उत्तरप्रदेशवाराणसी 24 नवंबर काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हड्डी रोग विभाग में शैक्षणिक गुणवत्ता लगातार गिरने से छात्रों और मरीजों के बीच चिंता गहरा गई है। स्थिति यह है कि विभाग में मेडिकल ऑफिसर एक तरफ ओपीडी में मरीजों का इलाज कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ उन्हें ओटी में ऑपरेशन करने की भी जिम्मेदारी निभानी पड़ रही है। वहीं, विभाग के कई प्रोफेसर अकादमिक गतिविधियों से ज्यादा राजनीति में व्यस्त बताए जा रहे हैं। सबसे गंभीर तथ्य यह है कि बीते पांच वर्षों से विभाग का नियमित विशेषज्ञ हेड (विभागाध्यक्ष) नियुक्त नहीं हो पाया, जिसके कारण विभाग की बागडोर डीन के भरोसे चल रही है। सूत्रों के अनुसार, उच्च पद पर लंबे समय से जमे कुछ अधिकारियों द्वारा काम में अनावश्यक अड़चनें डाली जा रही हैं, जिससे विभाग की कार्यप्रणाली बुरी तरह प्रभावित हो रही है। रेजिडेंट्स और कंसल्टेंट्स के मनोबल पर भी इसका सीधा असर दिख रहा है। आरोप है कि मनमर्जी से फर्जी शिकायती पत्र जारी किए जा रहे हैं, जिससे न केवल कार्य वातावरण तनावपूर्ण हो गया है, बल्कि युवा डॉक्टरों के आत्मविश्वास पर भी चोट पहुंच रही है। विभाग में अनुशासनहीनता का आलम यह है कि कुछ सीनियर रेजिडेंट निजी प्रैक्टिस में व्यस्त रहने के कारण नियमित क्लास नहीं लेते। इस संबंध में शिकायतें प्रशासन तक पहुंचने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इतना ही नहीं, कई रेजिडेंट बिना निर्धारित रोस्टर के दूसरी ओपीडी में जाकर बैठ जाते हैं, जिससे विभागीय कामकाज में अव्यवस्था और बढ़ जाती है। सूत्र बताते हैं कि ट्रॉमा सेंटर से जुड़े कुछ लोग भी विभाग में अकादमिक व क्लीनिकल काम में लगे हुए हैं, जिससे विभाग की मूल शैक्षणिक और शोध गुणवत्ता पर सवाल उठने लगे हैं। पिछले वर्ष छात्रों को ग्रेस नंबर देकर पास कराने तक की नौबत आ गई, जबकि इस वर्ष स्थिति और भी चिंताजनक हो गई।इस बार परीक्षा की जिम्मेदारी पीजीआई चंडीगढ़ और पीजीआई कोलकाता से आए हेड और प्रोफेसर को सौंपी गई। कड़े मानकों पर परखी गई परीक्षा में केवल पांच विद्यार्थी ही मापदंड पर खरे उतर पाए। परिणाम के बाद विभाग की शैक्षणिक तैयारियों और पढ़ाई की गंभीरता पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। विडंबना यह है कि जिन प्रोफेसरों पर आरोप है कि वे नियमित रूप से क्लास तक नहीं लेते थे, अब वही काशी हिंदू विश्वविद्यालय और उसके संस्थान की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं और अपनी कमियों का ठीकरा दूसरे लोगों पर फोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। विभाग की यह अंदरूनी खींचतान अब वरिष्ठ अधिकारियों तक भी पहुंच चुकी है। आरोप-प्रत्यारोप के इस दौर में संस्थान के अंदर निराशा और असंतोष का माहौल बन गया है। जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते नियमित विभागाध्यक्ष की नियुक्ति, अनुशासन बहाली और पारदर्शी प्रशासनिक हस्तक्षेप नहीं हुआ तो हड्डी रोग विभाग की शैक्षणिक प्रतिष्ठा को लंबी अवधि तक नुकसान झेलना पड़ सकता है। चिकित्सा शिक्षा से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में गिने जाने वाले काशी हिंदू विश्वविद्यालय के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। ऐसे में विभाग से जुड़े सभी जिम्मेदार पदाधिकारियों, प्रोफेसरों और प्रशासन को अपनी भूमिका और जिम्मेदारी समझते हुए तुरंत ठोस और सकारात्मक कदम उठाने की जरूरत है, ताकि छात्रों का भविष्य सुरक्षित रहे और संस्थान की साख बरकरार रह सके।